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Dharmik gyan | तर्पण का सच्च पंडित का महाज्ञान इंजिनयर हुए शर्मिंदा

Dharmik gyan | तर्पण का सच्च पंडित का महाज्ञान इंजिनयर हुए शर्मिंदा

Dharmik katha – संत और विज्ञानं Dharmik gyan | तर्पण का सच्च मंडित का महाज्ञान इंजिनयर हुए शर्मिंदा.

अयोध्या प्रयागराज की यह सच्ची घटना.

हमारे पूर्वजों ने जो भी परम्पराएं बनाई है हर परंपरा का गहन शोध किया जाए तो उनमे समतुष्ट कर देने वाले वैज्ञानिक तथ्य जरूर मिलेंगे ..

आज की पीढ़ी भले ही हर धार्मिक एवं संस्कारिक परम्परा मे वैज्ञानिक पहलु खोजती हो और खोजना भी चाहिए लेकिन तत्कालीन “संतुस्टी पूर्ण” तर्को का उत्तर ना मिलने पर वो ये समझ लेते है की यह सब अन्धविश्वास है.

 

तो चलिए आज आपको एक ऐसी ही कथा से अवगत करवाते है.

Dharmik-gyan

Dharmik gyan तर्पण का सच्च 

यह घटना है प्रयागराज की,प्रयागराज मे एक पंडित जी अपने पित्रों को तर्पण दे रहे थे. पंडित जी वेल एजुकेटेड थे फिर भी वो ये सब कर रहे थे.

 

पंडित जी को नदी मे तर्पण करता देख वहाँ मौजूद एक नई पीढ़ी का नौजवान आया और नदी मे आधे पाँव जल मे घुस कर हाथों से जल उठाया तथा सूर्य की ओर जल गिराते हुए उच्च स्वर मे आँखे बंद करके बोलता है! “यहां से कोसो दूर मेरी बकरी को प्यास लगी होगी ये जल उस तक जरूर पहुंचे.”

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नौजवान की इस मूर्खता भरी हरकत को देख पंडित जी हस पड़े और ऐतराज़ जताते हुए नौजवान से बोले अरे यजमान यह आप क्या बोल रहे हो यहां से पानी आपकी जीवित बकरी तक कभी नहीं पहुंचेगा.

 

इसपर नौजवान बोला! यदि आपका दिया हुआ जल पित्तरों तक पहुँच सकता तो मेरा यहां से अर्पण किया जल जल बकरी तक क्यों नहीं पहुँच सकता?

 

पंडित जी को नौजवान के अल्प ज्ञान पर बड़ा दुख हुआ हालांकि तर्पण करने के पीछे की परम्पमरा, आस्था का रहस्य और , वेदों के ज्ञान से पंडित जी भली भांति परिचित थे.

 

और पंडित जी इस बात से भी पूर्णतः अवगत थे की जल पित्रों तक पहुंचेगा या नहीं पर इसको नौजवान के सामने तत्काल सिद्ध कर पाना पंडित जी के लिए शायद असम्भव था क्योंकि उनके पास सिद्ध करने के लिए कोई मंत्र शक्ति या वस्तु उपलब्ध नहीं थी जिस वजह से उन्होंने उस नौजवान को उत्तर देना भी सही नहीं समझा और मौन हो गए.

 

इस घटना की वार्तालाप को सुन रहे एक इंजनियर ठहाका मार कर हसने लगे और बोले की – 

 

“सब पाखण्ड है जी..!” जिसका कोई सबूत ही नहीं उसका क्या अस्तितत्त्व.

 

अब इस बार वेदों के ज्ञाता पंडित जी ने चुप्पी तोड़ी और अब दोनों को ज्ञान से परिचित कराने के लिए…..नदी से बाहर निकलते हुए पंडित जी,

इंजिनियर बाबू के बगल रखी मेज पर  ‘कैलकुलेटर’ उठाकर एक नंबर डायल करते है…. और, केलकुलेटर अपने कान से लगा लेते है. पंडित जी बार बार हेलो हेलो करते रहे लेकिन दूसरी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आरही थी..इंजीनियर तो पंडित जी की इस हरकत को देख दंग था और उन्हें ताज्जुब भरी नजरो से देखे जा रहे था .

 

तब पंडित जी उस इंजीनियर साहब से शिकायत करते है की ये मशीन तो काम ही नहीं कर रही.

 

इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए.और, बोले- ” ये क्या मज़ाक है…??? ‘कैलकुलेटर’ में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???”आप अजीब बातें करते हो.

 

तब इस पर चुटकी बजाते हुए पंडित जी बोले …. तुमने सही कहा…

वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि….  स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ??? वो महाशय जी वहाँ खड़े जल अर्पित करते हुए बोलते है की जल मेरी बकरी तक पहुंचे.भला यह कैसे सम्भव है.

 

इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे- यानी अपनी नासमझी दलीलो को छुपाते हुए बोले की 

“ये सब पाखण्ड है महाशय , अगर ये सच है… तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए”तब हम माने की ये वास्तविकता है.

 

इस पर पंडित जी ने तुरंत बुद्धि दौड़ाई और बोले ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?

 

इंजीनियर बोला  – ” बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।” हाँ तो इससे क्या?

 

इतना सुनते ही पंडित जी ने वहाँ रखे चौक और पेपरवेट उठाया और इंजीनियर के हाथ पर थमाते हुए कहा!  अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी…!

 

अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए…!!

 

इंजीनियर साहब की बुद्धि अब काम ना करि, सब ज्ञान धरे का धरे रह गया और सर खुजलाने लगे.

 

साहब समझ गए और तनिक लज्जा भी गए और पंडित जी से पीछा छुड़ाने के लिए बहाना लगा कर वहाँ से निकल लिए.

 

तो दोस्तों  कहने का मतलब है कि….. यदि, हम किसी विषय/तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है ,

 

फिर इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.वो दुनियां मे एग्जिस्ट ही नहीं करती.

 

क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..

फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???

 

अब आप सिमित साधन की कमी या अल्प ज्ञान की वजह से तत्काल समय मे हवा से पानी बना पाने मे असक्ष्म है… तो इसका मतलब आप ये घोषित थोड़े ना कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है.

 

उसी तरह… हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि भी आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पित्तरों तक अवश्य पहुँचते हैं.

 

इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें…! अल्पज्ञान मन मे फालतू के तर्कों को जन्म देने की बजाय विनम्र होकर सही ज्ञान हासिल करने का प्रयास करें.

 

तो दोस्तों यह dharmik gyan आपको कैसी लगी जरूर बताना. ऐसी ही ज्ञान भरी कथाएं रोज पढ़ने के लिए हमारे blog पर बने रहें

 

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