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Dharmik katha |भगवान विष्णु के पांच छल

Dharmik katha -नमस्कार  दोस्तों, हर बार की तरह इस बार भी हम आपके लिए ज्ञान से भरी एक dharmik katha लेकर आए है. 

भगवान विष्णु ने लोक कल्याण के लिए किए थे  पांच छल! Dharmik katha

 

ज़ब ज़ब भी धरती पर पांप बढा है. धर्म पर आघात करके अधर्म की सीमा पार हुई है. तब तब भगवान वष्णु ने धरती पर अवतार लेकर अधर्मियों से धरती को मुक्त करते हुए पापो का नाश करके धर्म की पुनः स्थापना की है.

भगवान विष्णु युगो युगो से मानव कल्याण तथा धर्म की स्थापना के लिए कई अवतार लेते रहे है.

तो हमारी आज की dharmik katha भगवान विष्णु के उन 5 अवतारों के बारे मे है. जिनमे भगवान विष्णु ने मानव कल्याण हेतु छल और चतुराई का सहारा लेकर धरती पर धर्म का संतुलन बनाए रखा.

 

Dharmik katha – श्री हरि विष्णु जी के पांच छल. 

Dharmik-katha

भगवान विष्णु का पहला छल – नृतिकी अप्सरा अवतार – dharmik katha 

कई युगो पहले एक वृकासुर नाम का राक्षस हुआ करता था.

वृकासर का विवरण, शिवमहापुराण मे विस्तृत रूम मे किया गया है.

वृकासुर ने बहुत लम्बे समय तक भगवान शिव की घोर तपस्या करता रहा.

तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने वृकासुर को दर्शन दिये. और वरदान मांगने को कहा.

 

वृकासुर ने भगवान शिव ने  वरदान मे कहा की… मुझे ऐसा वरदान दें की मैं जिस किसी के भी सर पर हाथ रखूँ वो जल कर उसी समय भस्म हो जाए.

भगवान शिव ने तथास्तु बोलते हुए ये वरदान दे दिया.

यही से वृकासुर का नाम भस्मासुर पड़ा.

अब भस्मासुर को अपने अंदर एक अद्भुत शक्ति की अनुभूति होने लगी.

भस्मासुर के मन मे अचानक से ये विचार आया की देवता सदैव असुरो और दैत्यों से छल कपट करते आए है. अब ये वरदान सच्च मे मिला है या नहीं.

 

भस्मासुर ने इस वरदान के मिलते ही कहा, भगवन् क्यों न इस वरदान की शक्ति को परख लिया जाए।

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तब वह स्वयं शिवजी के सिर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा। शिवजी भी वहां से भागे और विष्णुजी की शरण में छुप गए। तब विष्णुजी ने एक सुन्दर स्त्री (नृतक अप्सरा) का रूप धारण कर भस्मासुर को आकर्षित किया।

 

भस्मासुर शिव को भूलकर उस सुंदर स्त्री के मोहपाश में बंध गया। मोहिनी स्त्रीरूपी विष्णु ने भस्मासुर को खुद के साथ नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। भस्मासुर भी अप्सरा के साथ साथ ताल कदम मिलते हुए नृत्य करने लगा.

नृत्य करते समय भस्मासुर मोहिनी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा।

 

शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर भी उन्ही की नकल करता हुआ अपने सर पर हाथ जैसे ही हाथ रखा वो वही जल कर भस्म हो गया.

इस तरह छल और चतुराई से भगवान विष्णु ने असुर का नाश किया.

 

 

भगवान विष्णु का दूसरा छल -वृंदा के साथ छल – dharmik katha 

युगो पहले धरती पर जालंधर नाम के एक महाबलशाली इंसान की उत्तपति हुई थीं. यह उत्तपत्ति समुद्र मे एक ऐसे स्थान पर हुई थीं जहाँ गंगा का जल समुद्र मे आकर मिलता था.

इसे जरूर पढ़े -जालंधर को भगवान शिव का अंश क्यों कहा जाता है? आखिर कैसे हुई जालंधर की उत्तपति. पूरी कथा.

 

जालंधर का विवाह कालनेमी नामक असुर की पुत्री वृंदा से हुआ. वृंदा भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी.

विवाह के पश्चात् जालंधर पूरे असुर साम्राज्य का राजा बन गया.

जालंधर को अपनी ताकत पर बहुत गुरुर हो गया था. जिसके चलते दैत्य गुरु शुक्राचार्य के समर्थन और मार्गदर्शन मे जालंधर ने देव लोको पर आक्रमण करके तीनो लोको का स्वामी बनने की तीव्र इच्छा जताई.

इधर वृंदा भगवान विष्णु की महान भक्त और उपासक के साथ साथ एक प्रतिव्रता नारी भी थीं.

जिसके चलते वृंदा अपने पति के विजय होने और उनके प्राणो की रक्षा के लिए पूरी निष्ठां से भगवान विष्णु का कठोर तप करने लगी.

उधर देव और असुरो के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया.

वृंदा का यह कठोर तप और पतिव्रता की शक्ति जालंधर की हर युद्ध मे एक अभेद सुरक्षा कवच बन कर रखा करने लगी.

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कोई भी अस्त्र शस्त्र जालंधर को छू तक नहीं पा रहे थे.

जिसके चलते जालंधर बहुत आसानी से देवो को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया.

जालंधर की कामना यही खत्म नहीं हुई. वो शिवलोक पर आक्रमण करने कैलाश पूछ गया.

कैलाश पर जाते ही जालंधर की भेट माता पार्वती जी से हुई. माता पार्वती के तेज और सुंदर रूप देख जालंधर माता पार्वती जी पर मोहित हो गया.

वासना मे चूर जालंधर ने विवाह का प्रस्ताव माता पार्वती के सम्मुख रखा.

माता ने जालंधर को साधन करते हुए वहाँ से चले जाने को कहा. तब जालंधर ने बल पूर्वक माता पार्वती को लेना जाना चाहा.

उसी समय माता ने भगवान शिव का आवाहन किया. भगवान शिव तुरंत वहाँ प्रगट हुए.

जालंधर और भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया.

चारो तरफ प्रलय मच गई.

सारा लोक परलोक इस युद्ध को देख रहा था.

भगवान शिव जालंधर पर जो भी वार करते उससे जालंधर को कोई हानि ना होती..

युद्ध लम्बे समय तक चलता रहा. कोई परिणाम नहीं निकल रहा था.

 

भगवान शिव मन ही मन भगवान विष्णु से आग्रह करने लगे की प्रभु पता लगाओ की आखिर कौन सि शक्ति जालंधर की रक्षा कर रही है. प्रुभ इसका तुरंत कोई समाधान निकालो. वरना अनर्थ हो जाएगा.

 

तब भगवान विष्णु समझ गए की कौन सि शक्ति जालंधर की रक्षा कर रही है.

यह शक्ति थी पतिव्रता और भगवान विष्णु की कठोर तप की.

भगवान विष्णु ने तुरंत जालंधर का रूप धरा और अपनी माया से राक्षसों की सेना तैयार की.

सेना सहित भगवान विष्णु धरती पर वृंदा के महल मे पहुचे.

 

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जालंधर को देख वृंदा ने तप करना छोड़ जालंधर के निकट आई और आरती उतारी.

भगवान विष्णु जी ने तप तो खंडित करवा दिया था लेकिन पतिव्रता की शक्ति तोड़ने के लिए

भगवान विष्णु जी को मजबूरन पति धर्म का नाटक भी करना पड़ा. जिसके चलते वृंदा की पतिव्रता शक्ति नष्ट हो गई.

शक्ति नष्ट होते ही… वहाँ कैलाश पर भगवान शिव जी ने जालंधर का गला धड़ से अलग कर दिया.
जालंधर का वध होते ही… स्वर्ग लोग पुनः देवताओं का हो गया.

इस प्रकार लोक कल्याण के लिए

भगवान विष्णु जी ने वृंदा के साथ यह छल किया.

सत्य के पता चलने पर क्रोध मे आकर वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया.

इसके बाद क्रोध भरे मन से वृंदा ने खुद का आत्मदाह कर लिया, तब उसकी राख के ऊपर तुलसी का एक पौधा जन्मा।

तुलसी देवी वृंदा का ही स्वरूप है जिसे भगवान विष्णु लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय मानते हैं।

भारत के पंजाब प्रांत में वर्तमान जालंधर नगर जलंधर के नाम पर ही है। जालंधर में आज भी असुरराज जलंधर की पत्नी देवी वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है।

 

मान्यता है कि यहां एक प्राचीन गुफा थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। माना जाता है कि प्राचीनकाल में इस नगर के आसपास 12 तालाब हुआ करते थे। नगर में जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था.

 

भगवान विष्णु का तीसरा छल – मोहिनी रूप -dharmik katha 

दोस्तों यह अद्भुत घटना समुद्र मंथन के समय की है.

एक बार महर्षि दुर्वाषा बैकुंठ धाम से वापिस आ रहे थे.. रास्ते मे उन्होंने, राजा इंद्र को अपने ऐरावत हाथी पर सवार हो कर अपनी ओर आते हुए देखा.

महर्षि दुर्वाषा जी ने उनका सवागत सत्कार करते हुए उन्हें कमल के फूल की दिव्य माला भेट की.

अहंकार मे डूबे इंद्र ने भेट स्वरूप मिले उस कमल की माला को मामूली समझ कर उसे अपने हाथी ऐरावत की सर पर फेंक दी.

माला गिर कर हाथी के पैरो मे जा गिरी.. ऐरावत ने उस माला को अपने पैरो तले कुचल दिया.

दिये गए भेट का इस प्रकार निरादर करने पर महर्षि दुर्वाषा बहुत क्रोधित हुए.

क्रोध मे आकर महर्षि दुर्वाषा जी ने इंद्र को श्री हीन होने का श्राप दे दिया. जिसके चलते इंद्र की सभी शक्तियां नष्ट हो गई. इंद्रलोक इंद्र से विहीन हो गया.

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इस मौक़े का फायदा उठाकर दैत्यों ने इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया.
देवताओं को हराकर दैत्यों ने इंद्रलोक पर अपना कब्ज़ा कर लिया. और देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया.

 

त्राहिमाम करते हुए इंद्र ब्रम्हा जी सहित श्री हरि के चरणों मे सहायता हेतु पहुंचे.

भगवान विष्णु संसार एवं मानव जाती के कल्याण के लिए लक्ष्मी जी के साथ समुद्रमंथन पर विचार विमर्श कर रहे थे की इतने मे. इंद्र, भगवान ब्रम्हा जी सहित सभी देवता गणो के साथ भगवान विष्णु के सम्मुख पहुचे.

जरूर पढ़े -समुद्रमंथन क्यों किया किया गया था.? पूरी कथा.

 

श्री हरि के सम्मुख, इन्द्र अपना स्वर्गलोक वापस पाने के लिए प्रार्थना करने लगे।

तब श्री हरि विष्णु के मन मे समुद्रमंथन को लेकर एक तीर से दो निशाने वाली.. एक ऐसी युक्ति आई. जिससे इंद्रलोक भी वापिस मिल जाएगा और समुद्रमंथन भी हो जाएगा.

श्री हरि विष्णु इंद्र सहित सभी देवताओं को अमृत का लालच देते हुए बोले..

की अब दैत्यों से मुकाबला करके अपना इंद्रलोक वापिस लेने के लिए तुम सभी देवताओं को अमरता हासिल करनी होगी. इसकेलिए तुम सब को अमृत का सेवन करना होगा.

और यह अमृत प्राप्त करने का एक ही विकल्प है और वो है समुद्र मंथन.

समुद्र मंथन से सिर्फ अमृत ही नहीं बल्कि समस्त संसार तथा मानव कल्याण के लिए बहुत ही उपयोगी वस्तुए बाहर निकल कर आएंगी.

लेकिन समुद्रमंथन सभी देवता मिल कर अकेले नहीं कर पाओगे. इसके लिए असुरो की भी मदद लेनी होगी.

इसलिए आप असुरो से यह सन्धि करो की समुद्रमंथन से निकलने वाले अमृत को हम सब आधा आधा बाट लेंगे.

सभी देव ये प्रस्ताव लेकर बिना देरी किये असुरो के पास पहुचे.

प्रस्ताव मे अमृत का नाम सुनते ही सभी दैत्य समुद्रमंथन के लिए तुरंत राजी हो गए.

इस तरह भगवान विष्णु के मार्गदर्शन मे. देवताओं और दैत्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाते हुए.

मदरांचल पर्वत को उठाकर समुद्र तट पर लेकर जाने की चेष्टा की लेकिन नहीं उठा पाए तब श्रीहरि ने अपनी शक्ति का भी सहयोग देकर उसे उठाकर समुद्र में रख दिया।

मदरांचल को मथानी एवं वासुकि नाग की रस्सी बनाकर समुद्र मंथन का शुभ कार्य आरंभ हुआ।

श्रीविष्णु की नजर मथानी पर पड़ी, जो कि अंदर की ओर धंसती चली जा रही थी।

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यह देखकर उन्होंने स्वयं कच्छप बनाकर अपनी पीठ पर मदरांचल पर्वत को रख लिया।

तत्पश्चात समुद्र मंथन से लक्ष्मी, कौस्तुभ, पारिजात, सुरा, धन्वंतरि, चंद्रमा, पुष्पक, ऐरावत, पाञ्चजन्य, शंख, रम्भा, कामधेनु, उच्चैःश्रवा और अंत में अमृत कुंभ निकले जिसे लेकर धन्वन्तरिजी आए।

 

 

उनके हाथों से अमृत कलश छीनकर दैत्य भागने लगे ताकि देवताओं से पूर्व अमृतपान करके वे अमर हो जाएं। दैत्यों के बीच कलश के लिए झगड़ा शुरू हो गया और देवता हताश खड़े थे।

तब श्री हरि विष्णु जी ने एक सुंदर स्त्री का मोहिनी रूप धड़ कर देवता और दैत्यों के बीच पहुंच गए और उन्होंने अमृत को समान रूप से बांटने का प्रस्ताव रखा।

 

सभी दैत्य भगवान विष्णु के इस मोहिनी अवतार पर पूरी तरह से मोहित हो चुके थे.

 

दैत्यों ने मोहित होकर अमृत का कलश श्रीविष्णु को सौंप दिया।

मोहिनी रूपधारी विष्णु ने कहा कि मैं जैसे भी विभाजन का कार्य करूं, चाहे वह उचित हो या अनुचित, तुम लोग बीच में बाधा उत्पन्न न करने का वचन दो तभी मैं इस काम को करूंगी।

सभी ने मोहिनीरूपी भगवान की बात मान ली। देवता और दैत्य अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए। मोहिनी रूप धारण करके विष्णु ने छल से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया, इस छल का जैसे ही पता चला.. तब तक देर हो चुकी थीं.

इस प्रकार सभी असुरो ने इंद्रलोक को छोड़ कर चले जाना ही समझदारी समझी. क्यों अब वो देवताओं को पराजित नहीं कर सकते थे.. देवता अमृत के सेवन से अब अमर हो चुके थे.

Dharmik katha

 

भगवान विष्णु का चौथा छल – असुरराज बलि के साथ छल.-dharmik katha 

 

असुरों के राजा बलि की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। दान-पुण्य करने में वह कभी पीछे नहीं रहता था।

उसकी सबसे बड़ी खामी यह थी कि उसे अपनी शक्तियों एवं दानवीर होने पर घमंड था और वह खुद को ईश्वर के समकक्ष मानता था और वह देवताओं का घोर विरोधी था।

 

कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ।

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राजा बलि का राज्य संपूर्ण दक्षिण भारत में था। उन्होंने महाबलीपुरम को अपनी राजधानी बनाया था। आज भी केरल में ओणम का पर्व राजा बलि की याद में ही मनाया जाता है।

 

राजा बलि ने विश्वविजय की सोचकर अश्वमेध यज्ञ किया और इस यज्ञ के चलते उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी। अग्निहोत्र सहित उसने 98 यज्ञ संपन्न कराए थे और इस तरह उसके राज्य और शक्ति का विस्तार होता ही जा रहा था, तब उसने इंद्र के राज्य पर चढ़ाई करने की सोची।

इंद्रलोक पर विजय पाने हेतु
राजा बलि ने 99वें यज्ञ की घोषणा की. अगले ही दिन सुबह यज्ञ प्रारम्भ की शुरुआत होने लगी.

इंद्रलोक बलि की शक्ति से पहले डगमगाने लगा.. देवता समझ गए थे की यदि ये यज्ञ पूरा हुआ तो इंद्रलोक पर बलि की वजय निश्चित है.

राजा बलि यज्ञ से पहले दान पुण्य का कार्य करता था.

ऐसा एक दिन होगा इसलिए भगवान विष्णु जी 12 साल पहले ही

केरल मे माता अदिति के यहां जन्म लें चुके थे. और एक दिन जब बलि यज्ञ की योजना बना रहा था तब वे ब्राह्मण-वेश में वहां दान लेने पहुंच गए। उन्हें देखते ही शुक्राचार्य उन्हें पहचान गए।

 

शुक्र ने उन्हें देखते ही बलि से कहा कि वे विष्णु हैं। मुझसे पूछे बिना कोई भी वस्तु उन्हें दान मत करना।

लेकिन बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं सुनी और वामन के दान मांगने पर उनको तीन पग भूमि दान में दे दी।

जब जल छोड़कर सब दान कर दिया गया, तब ब्राह्मण वेश में वामन भगवान ने अपना विराट रूप दिखा दिया। भगवान ने एक पग में भूमंडल नाप लिया।

 

दूसरे में स्वर्ग और तीसरे के लिए बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखूं?

पूछने पर बलि ने मुस्कराकर कहा- इसमें तो कमी आपके ही संसार बनाने की हुई, मैं क्या करूं भगवान? अब तो मेरा सिर ही बचा है।

 

 

इस प्रकार विष्णु ने उसके सिर पर तीसरा पैर रख दिया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे पाताल में रसातल का कलियुग के अंत तक राजा बने रहने का वरदान दे दिया। तब बलि ने विष्णु से एक और वरदान मांगा।

राजा बलि ने कहा कि भगवान यदि आप मुझे पाताल लोक का राजा बना ही रहे हैं तो मुझे वरदान ‍दीजिए कि मेरा साम्राज्य शत्रुओं के प्रपंचों से बचा रहे और आप मेरे साथ रहें। अपने भक्त के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने राजा बलि के निवास में रहने का संकल्प लिया।

पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर भगवान विष्णु सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे और इस तरह बलि निश्चिंत होकर सोता था और संपूर्ण पातालपुरी में शुक्राचार्य के साथ रहकर एक नए धर्म राज्य की व्यवस्था संचालित करता है।

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भगवान विष्णु का पाँचवा छल – सुंदर बालक रूप. बद्रीधाम कथा. dharmik katha 

माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम कभी भगवान शिव और पार्वती का विश्राम स्थान हुआ करता था।

 

यहां भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते थे लेकिन श्रीहरि विष्णु को यह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने इसे प्राप्त करने के लिए योजना बनाई।

पुराण कथा के अनुसार सतयुग में जब भगवान नारायण बद्रीनाथ आए तब यहां बदरीयों यानी बेर का वन था और यहां भगवान शंकर अपनी अर्द्धांगिनी पार्वतीजी के साथ मजे से रहते थे।

एक दिन श्रीहरि विष्णु बालक का रूप धारण कर जोर-जोर से रोने लगे।

उनके रुदन को सुनकर माता पार्वती को बड़ी पीड़ा हुई। वे सोचने लगीं कि इस बीहड़ वन में यह कौन बालक रो रहा है? यह आया कहां से?

और इसकी माता कहां है? यही सब सोचकर माता को बालक पर दया आ गई। तब वे उस बालक को लेकर अपने घर पहुंचीं।

 

शिवजी तुरंत ही ‍समझ गए कि यह कोई विष्णु की लीला है। उन्होंने पार्वती से इस बालक को घर के बाहर छोड़ देने का आग्रह किया और कहा कि वह अपने आप ही कुछ देर रोकर चला जाएगा।

लेकिन पार्वती मां ने उनकी बात नहीं मानी और बालक को घर में ले जाकर चुप कराकर सुलाने लगी।

 

कुछ ही देर में बालक सो गया तब माता पार्वती बाहर आ गईं और शिवजी के साथ कुछ दूर भ्रमण पर चली गईं। भगवान विष्णु को इसी पल का इंतजार था। इन्होंने उठकर घर का दरवाजा बंद कर दिया।

 

भगवान शिव और पार्वती जब घर लौटे तो द्वार अंदर से बंद था। इन्होंने जब बालक से द्वार खोलने के लिए कहा तब अंदर से भगवान विष्णु ने कहा कि अब आप भूल जाइए भगवन्। यह स्थान मुझे बहुत पसंद आ गया है।

मुझे यहीं विश्राम करने दी‍जिए। अब आप यहां से केदारनाथ जाएं। तब से लेकर आज तक बद्रीनाथ यहां पर अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हैं और भगवान शिव केदानाथ में।

तो दोस्तों यह थे लोक कल्याण के लिए भगवान विष्णु के 5 छल.

उम्मीद करता हूं ये dharmik katha  आपको बहुत पसंद आई होगी.

 

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