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Arunima sinha biography hindi 1 सच्ची घटना

Arunima sinha biography hindi – नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका एक बार फिर से सीने मे कामयाबी की आग लगा देने वाली inspirational success biography मे. 

 

आज में एक ऐसी भारतीय लड़की की biography को कवर करने जा रहा हूं जिसकी सोच, हौसलों, और ज़िद्द ने सफलता हासिल करने  के पागलपन की सारी सीमाए तोड़ दी. 

 

जिसने ये साबित कर दिया की औरत कमजोर नहीं होती. और इंसान हर बड़ी से बड़ी सफलता को हासिल कर  सकता है बस मन मे एक ज़िद्द और इरादे मजबूत होने चाहिए. 

 

अरूणिमा सिन्हा, जिद्द का एक ऐसा नाम जिसने पूरी दुनियां को ये इंस्पिरेशन दे डाली की इंसान शरीर से नहीं बल्कि मन से अपंग हो होता है. ज़ब वो कहता है  की ये मुझसे नहीं होगा तुमसे नहीं होगा, नामुमकिन है. 

 

इस लड़की की जिंदगी मे जो घटना घटी वो सुन कर पूरी दुनियां का दिल दहल उठा, रोंगटे खड़े हो गए और फिर भी इस लड़की ने अपनी जिद्द और पागलपन से  जो कर दिखाया वो करने के बारे कोई साधारण इंसान सपने मे भी नहीं सोचता.  

 

जी हाँ हम बात कर रहे है अरूणिमा सिन्हा की जिसने  दुनियां की सबसे ऊंची चोटी माउंटएवरेस्ट को फतेह करके तिरंगा लहराकर कर  पहली भारतीय महिला का ख़िताब अपने नाम किया. और सफलता के इतिहास मे अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करवाया. 

 

एक सेकेंड एक सेकंड, क्या बोला ! विकलांग महिला… 

 

ये कैसे सम्भव हो सकता है,

 विकलांग होने के बावजूद भी माउंटएवरेस्ट फतेह कर लिया.. ये क्या मजाक है ये. 

 जनाब ये मजाक नहीं सच्च है. लेकिन ये असम्भव सा लगने वाला काम  सम्भव कैसे हो पाया आज हम वहीं बताने जा रहे है. 

 

Arunima sinha  biography hindi 

Arunima-sinha

 

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Arunima Sinha का जन्म सन 1988 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार मे हुआ. अरूणिमा को बचपन से ही खेल कूद मे बहुत शौक था. जिसमे से वालीबॉल उनका पसंदीदा खेल रहा. 

 

पढ़ाई के साथ वालीबॉल की तमाम  खेल प्रतियोगिताओं मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती. थी. 

 

समय बीतता गया, अरूणिमा अब एक राष्ट्रीय स्तर की वालीबॉल खिलाड़ी (national level volleyball player) बन चुकीं थी. 

 

यानी अब तक सब कुछ ठीक चल रहा था. 

 समय आया 11 अप्रैल 2011 का यानी अरूणिमा की जिंदगी का एक ऐसा दर्दनाक दिन जिसके बारे सोचते ही रूह कांप जाती है. 

 

अरूणिमा, लखनऊ से दिल्ली की तरफ जा रही ट्रेन पद्मावती एक्सप्रेस के एक खाली डिब्बे मे सवार होती है. 

 

कुछ स्टेशनों के बाद उसी डिब्बे मे कुछ शातिर बदमाश भी सवार हो जाते है. 

 

अरूणिमा के गले मे सोने चमकती चेन को देख कर बदमाह अरूणिमा की तरफ बढ़ने लगे,और  गले की चेन खींचने का प्रयास किया, खूब हाता पाई हुई. 

 

लेकिन अरूणिमा अकेली थीं इस वजह से वो उनसे जीत ना पाई. 

 

गुंडों ने चलती ट्रेन से अरूणिमा को बाहर फेक दिया.

 

 अरूणिमा का एक पैर पटरियों की चपेट मे आने से ट्रेन के टायर उसके पैरो रौंदती हुई निकल गई. 

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अरूणिमा दर्द से चिल्ला उठी,रात का समय था  जगह बहुत वीरान थी दूर दूर तक कोई इंसान नहीं था, इस वजह से अरूणिमा की आवाज़ कोई सुन नहीं पाया. 

 

अरूणिमा ने बहुत कोशिस की लेकिन वो खुद को हिला भी नहीं पा रही थीं.. खून बहता रहा सारी  रात ट्रेने टांगो के ऊपर से गजरती रही. एक टांग कट कर पूरी अगल हो चुकीं थीं. 

 

खून की बदबू से चूहें वहाँ जमा हुए और कटे हुए मांस को कुतरना शुरू कर दिया. 

सुबह ज़ब कुछ लोग वहाँ से गुज़र रहे थे तो उनकी नजर अरूणिमा पर पड़ी. 

 

अरूणिमा बेहोश पड़ी थी पर सांसे चल रही थीं. हालत बहुत दयनीय और दिल दहला देने वाली थी  

 

लोगो ने तुरंत पास के hospitel मे एडमिट करवाया. खून चढ़ाया गया. पता चलने पर की अरूणिमा एक नेशनल प्लेयर है तो तुरंत परिजनों को सम्पर्क किया गया. 

 

अरूणिमा को उस hospitel से दिल्ली के  एक बहुत बड़े – AIIMS hospitel मे भर्ती करवाया गया. 

 

जिंदगी और मौत से जंग लड़ रही अरूणिमा के हौसले अब भी मजबूत थे.  हार नहीं मानी थीं. 

 

4 महीने तक इलाज और सर्जरी चलती रही. अरूणिमा के बाएं  पैर मे रोड फ़िट की गई और दाए पैर तो था नहीं इसलिए उसकी जगह कृत्रिम पैर जोड़ा गया. 

 

दो तीन महीना अरूणिमा hospitel मे परिवार और डॉक्टरों की निगरानी मे रही. इस बीच धीरे धीरे चलना फिरने का प्रयास भी किया. 

 

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दोस्तों ये जिंदगी की वो  सिचुएशन थीं जिसमे कोई साधारण सोच वाला  इंसान होता तो कब का मर चुका होता. 

 

अब काफ़ी हद तक अरूणिमा की हालत ठीक थीं, वो चाहती तो घर जा कर अपने परिवार के साथ रह कर आराम से बाक़ी की जिंदगी काट सकती थीं, लेकिन अरूणिमा ने ऐसा नहीं किया. 

 

 अरूणिमा को शायद ये मंजूर नहीं था की उसकी जिंदगी दूसरों पर बोझ बन कर रहे. और  उसकी जिंदगी दूसरों के सहारो की मोहताज़ बन कर रह जाए. 

 

तो फिर अरूणिमा के दिमाग़ मे आखिर  ऐसा क्या चल रहा था जो उसे ऐसा सोचने पर मजबूर कर रही थीं. 

 

अरूणिमा ने अपने कई इंटरव्यू और speech के दौरान इस बात का खुलासा किया की उस समय अरूणिमा ये फैसला कर चकी थीं की मैं, अब शायद कभी वॉलीबाल खेलु  या ना खेलु लेकिन मैं एक ऐसा लक्ष्य बनाउंगी जिसे लोग नामुमकिन कहते है. वो लक्ष्य हासिल करके मैं अपना नाम इतिहास मे दर्ज करवाउंगी और उन करोड़ो महिलाओ तथा  विकलांग लोगो के लिए इंस्पिरेशन बनूंगी जो जिंगदी मे हार मान जाते है. 

 

मैं  अपने आगे के जीवन संघर्ष से लोगो की सोच बदल कर रख दूंगी की इंसान के इरादे ग़र मजबूत हो तो वो कुछ भी हासिल कर सकता है.  

 

एक ट्रेन के दर्दनाक हादसे मे अपने पैर खो चुकीं अरूणिमा सिन्हा के अंदर जिंदगी को फिर से  एक नए सिरे से शुरू से करने की उम्मीद और आगे बढ़ कर कुछ बड़ा कर दिखाने का जुनून ये साबित कर चुका था की उसके अंदर एक नेशनल प्लेयर की ताकत आज भी जिन्दा है. 

 

आखिर कार अरूणिमा ने फैसला किया, “वो करने का” जिसके बारें कोई साधारण इंसान सपने मे भी नहीं सोचता. 

 

जी हाँ arunima sinha मन ही मन फैसला कर चुकीं थीं, तमाम चैलेंजिंग हिमालय चोटियों के साथ साथ दुनियां की सबसे ऊंची  चोटी माउंटएवरेस्ट को भी फतेह करने का. 

 

ये बात जैसे ही डॉक्टरों परिवारों को पता चली तो सब हैरान हो गए, कोई हसने लगा तो कोई उसे पागल कहने लगा. तो मजाक समझने लगा. 

 

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लेकिन  इन लोगो की इस हसीं से  arunima sinha के इरादे और मजबूत हो चुके थे. 

 

Arunima sinha का ये फैसला अब उसकी आगे की तकदीर लिखने वाला था. 

 

फैसला, ज़िद्द और जुनून मे बदल चुका था.. बस अब जरूरत थीं उसे सच्च मे बदलने की. 

 

कुछ दिन बाद arunima sinha मन मे जुनून की आग लिए ट्रेनिंग लेने के लिए, बिछेंद्री पाल के पास पहुंची. 

 

(माउंटएवरेस्ट को फतेह वाली बिछेंद्री पाल भारत की सबसे पहली महिला है )

 

अरूणिमा की कहानी और इरादे जानने के बाद बिछेंद्रीपाल ने सबसे पहले तो arunima sinha के हौसलों की तारीफ की. और यह भी कहा की, ऐसी हालत मे भी ये इरादे, सच्च कहूं तो तुम, माउन्ट एवरेस्ट फतेह कर चुकीं हो. 

बस अब उसे दुनियां वालों के सामने  साबित कर के दिखना है. 

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 Arunima sinha की हालत को देखते हुए पहले तो बिछेंद्री पाल जी ने उन्हें ट्रेनिंग देने से मना कर दिया था. लेकिन अरूणिमा की लम्बी बहस और जिद्द के सामने बिछेंद्री पाल  जी को झुकना ही पड़ा. 

 

बस फिर क्या था ट्रेनिंग की शुरुआत हुई. अभी घाव भी ठीक से भरे नहीं थे और ये लड़की मजबूत इरादे लिए माउंटएवरेस्ट को फतेह करने की पूरी  जिद्द पर थीं, इसे कहते है ज़िद्द, जुनून. होंसला. आत्मविश्वास. 

 

1 साल 8 महीने खूब प्रेक्टिस की,पूरी ताकत झोंक दी. इस बीच कई बड़े पर्वतो को फतेह किया  और अब वो पूरी तरह तैयार थीं. माउंटएवरेस्ट को फतेह करने के लिए. 

 

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25 मार्च 2013 को arunima sinha सहित पूरी टीम दवाई माउंटएवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की गई.

 

यकीन मlnhi करोगे, चोटी तक पहुंचने के लिए 56 दिन का लम्बा वक़्त लग गया,  कुल 56 दिनों की कड़ी मशक्क्त, तमाम उतार चढ़ाव के बाद जा कर आखिर कार arunima sinha ही मात्र दो परतारोहियों सहित चोटी तक पहुंच पाई. और इस तरह फतेह हासिल कर जोर से वन्देमातरम चीखती हुई  गाड़ दिया तिरंगा माउंटएवरेस्ट की चोटी पर. 

 

दोस्तों ये सुनने मे जितना आसान लग रहा उतना था नहीं. क्योंकि इस चढ़ाई करते समय ऐसे ऐसे मुकाम बहुत आए जिससे  अच्छो अच्छो पर्वतारोहियों का होंसला धरे का धरा रह जाता है. 

 

जी हाँ ऐसे मुकाम जहाँ से आँखो के सामने अपनी साथी पर्वतारोहियों को मरते देखा. 

 

आधा दर्जन से ज्यादा पर्वतारोहियों की सामने पड़ी लाशें रोंगटे खड़ी कर देती थीं। कभी बर्फ उन्हें ढक देती कभी हवा के झोके उन पर ढ़की बर्फ हटा देते।

 

ऐसे अत्तयंत भयानक और मनोबल तोड़ देने वाले दृश्य और यहां तक की एक समय ऐसा भी, जहाँ ऑक्सीजन तक खत्म होने को होता है.

 

एक परसेंट भी स्टेमिनर नहीं बचता आगे बढ़ने का. जिसके चलते कुछ पर्वत रोहि ये सोच कर वापसी कर लेते है की जिनगी रही तो फिर कर लेंगे फतेह, ज़ब की भी बस कुछ फैसले ही दूरी पर थीं.  

 

अरूणिमा चाहती तो वापसी कर सकती थीं. लेकिन दांव की बाज़ी लगा चुकीं अब अरूणिमा ठान चुकीं थीं.. मौक़े बार बार नहीं मिलते, अब जिन्दी रहु या मरू. लेकिन यहां तक आई हूं तो पीछे  नहीं हटूंगी. 

 

बस इसी जुनून और ज़िद्द ने अरूणिमा मे फिर से एक जान फूंकी और पहुंच गई चोटी तक. 

 

ख़ुशी का ठिकाना नहीं था आंसू रुक नहीं रहे थे. 

 

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इसी के साथ अरूणिमा का नाम इतिहास मे, माउंटएवरेस्ट फतेह करने वाली पहली भारतीय  विकलांग महिला के रूप मे सदा के लिए अमर हो गया. 

 

ऐसे दर्दनाक हादसे के बाद जहां रिकवरी में लोगो को 4 से 5 साल लग जाते हैं, वहीं अरुणिमा ने एक खिलाड़ी के तौर पर अपने अंदर बसे जुनून को बरकरार रखते हुए घटना के महज दो साल के अंदर ही  दुनिया की सबसे ऊंची जगह, माउंट एवरेस्ट फतह कर दिखाया.

 

अपनी इसी जीत के साथ उन्होंने दुनियां भर के लोगो को message दे डाला की इंसान विकलांग शरीर से नहीं बल्कि अपनी मानसिकता(सोच) से होता है. 

 

अरूणिमा ने अपनी इस जीत से बहुत सारी inspiration पूरी दुनियां को दी. 

 

चलिए दोस्तों अब जानते माउंटएवरेस्ट के बाद अरूणिमा ने दुनियां मे मौजूद ओर कितनी पर्वत चोटियों को फतेह कर तिरंगा फहराया. 

 

अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो (Kilimanjaro: To the Roof of Africa) और यूरोप की एलब्रुस चोटी (Mount Elbrus) पर तिरंगा लहरा चुकी हैं।

 

चलिए दोस्तों अब जानते है,अब देश का गौरव बन चुकीं  अरूणिमा सिन्हा को किस किस प्रकार से और किन किन संस्थाओ एवं महान हस्तियों द्वारा  सम्मान से सम्मानित किया गया. 

 

अरुणिमा सिन्हा की पुरस्कार और सम्मान : अरुणिमा सिन्हा को कौन सा पुरस्कार मिला ? Which award did Arunima Sinha get ? 

 

आज उनको भारत की सरकार तथा दूसरी संस्थाएं कई अवार्ड और सम्मान से सुशोभित कर चुकी हैं 

 

👉🏻 अरुणिमा सिन्हा को भारत सरकार की तरफ से 2015 में पदमश्री नाम के पुरस्कार से सम्मानित किया गया , जो कि भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है . 

 

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पदमश्री पुरस्कार को भारत में किसी एक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले इंसान को दिया जाता है .

 

 खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणिमा की जीवनी – ‘ बॉर्न एगेन इन द माउंटेन ‘ का लोकार्पण किया । 

 

  • अरुणिमा को वर्ष 2016 में तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड भी दिया गया . 

 

इनके द्वारा दिए गए योगदान को देखते हुए प्रथम महिला पुरस्कार से सन् 2018 में सम्मानित किया गया ।

 

  • उत्तर प्रदेश में सुल्तानपुर जिले के भारत भारती संस्था ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली इस विकलांग महिला को सुल्तानपुर रत्न अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने की घोषणा की ।

 

 सन 2016 में अरुणिमा सिन्हा को अम्बेडकरनगर रत्न पुरस्कार से अम्बेडकरनगर महोत्सव समिति की तरफ से नवाजा गया । 

 

  • इतना ही नही वे गरीबो और दिव्यांगों की सहायता के लिए शहीद चंद्रशेखर आजाद विकलांग खेल अकादमी ” के नाम से एक संस्था भी चलाती हैं । II

 

तो दोस्तों जुनून से भरी arunima sinha biography की इस inspirational पोस्ट से आपने क्या सीखा. 

 

में चाहता हूं की अरुणिमा सिन्हा की ये संघर्ष भरी inspirational life हर भारतीय तक पहुचनी चाहिए ताकी वो लोग इनकी जिंदगी से प्रेरित हो कर जीवन मे आने वाली परेशानियों के सामने कभी हार ना माने. पूरी हिम्मत से जीवन मे आगे बढ़ कर बड़े से बड़े लक्ष्य हासिल करें . 

 

इसलिए निवेदन करता हूं इस पोस्ट को ज़ादा से ज़ादा लोगो मे शेयर करें. 

 

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