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hindi Religious story हनुमान vs सुधर्शन चक्र और गरुण

hindi Religious story हनुमान vs सुधर्शन चक्र और गरुण धार्मिक कथा – दोस्तों स्वागत है आपका धार्मिक  कहानियों इस रोचक दुनिया मे | यहाँ पर आपको motivational stories के साथ moral stories से मिलने वाले ज्ञान से रुबारू करवाया जाता है |

religious stories in hindi मे हम आपको धार्मिक ज्ञान से जुड़े  ऐसे तथ्यों से रूबरू करवाते है जिसके बारे मे बहुत कम लोग ही परिचित होते है |

आज कल इंटरनेट का जमाना है जिस वजह से किताबों का चलन अब इतना नहीं रहा  तो इस aबात को ध्यान मे रखते हु हम उन्ही धार्मिक किताबों से   उस ज्ञान को उठा कर आप तक लेकर आए है |

कुछ धार्मिक ज्ञान ऐसे होते है जिसे हम religious stories in hindi  की मदद से आप तक पहुंचाते है |

 

दोस्तो ऐसी ही हजारो शिक्षा प्रद , लोकप्रिय और रोचक कहानियों का सफर हम आप तक लेकर आए है जिन्हे लोगों ने बचपन मे अपने दादा दादी – या  नाना- नानी  से सुनी होती है या फिर टीवी मे देखी होती है |

लेकिन यहाँ पर आपको ऐसी बहुत सी शिक्षा प्रद , लोकप्रिय और रोचक कहानियाँ मिलेंगी जिसे शायद ही आपने कही सुनी होंगी | तो पढ़ते रहिए ऐसी कहानियाँ और सीखते रहिए एक नई सीख  ,साथ मे ऐसी शिक्षा प्रद कहानियाँ  अपने दोस्तो को भी शेयर करते रहिए | Religious story hindi |धार्मिक कथा -हनुमान VS बाली

 

 

आज की कहानी है 

हनुमान जी ने किया था सत्यभामा ,गरुड़ और सुदर्शन चक्र का घमण्ड चूर-चूर!

hindi Religious story हनुमान vs सुधर्शन चक्र और गरुण

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hindi Religious story  एक बार की बात हैं भगवान श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा को पारिजात वृक्ष लाकर दिया था जिसके चलते सत्यभामा को खुद पर यह घमंड हो गया की वह श्री कृष्ण की सबसे प्रिय हैं और पूरे लोक मे उनसे सुंदर कोई नहीं हैं.

 

वही दूसरी तरफ भगवान विष्णु के सुधर्षन चक्र ने इंद्र देव के अभिमान को तोड़ा था इसके इलावा और भी कई बड़े बड़े राक्षसों का नाश किया ऐसे मे सुधर्षन चक्र को खुद पर यह अभिमान हो गया था की

भगवान हर बड़ी बुराई का नाश करने के लिए मेरा ही सहारा लेते हैं क्योंकि मैं ही पूरे ब्रम्हांड का सबसे शक्तिशाली अस्त्र हूं. मेरा सामने कोई शक्ति नहीं टिक सकती. मेरा सामना कोई नहीं कर सकता.

 

 

वही विष्णु जी के वाहन गरुण जी को यह अभिमान हो गया था की भगवान विष्णु मेरे बिना कहीं नहीं जाते. मैं ही ब्रम्हांड का अधिक तीव्रवान वाहन हूं. मेरे प्रभु को कहीं भी तुरंत जाना को तो मेरा ही सहारा लेते हैं.

सिर्फ यही नही गरुण जी मे जन्म से ही अथाह बल था जिसके चलते आगे चल कर उनमे अपनी ताकत को लेकर यह अभिमान हो गया की धरती पर उनसे अधिक बलवान कोई नहीं |

 

 

 

तो इन तीनो का घमंड तोड़ने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने हनुमान जी का आवाहन किया.क्योंकि वह जानते थे की हनुमान जी महादेव के अवतार हैं उनमे असीमित शक्तियां हैं अतः इन तीनो का घमंड तोड़ने मे सक्षम हैं.

 

हनुमान जी  भगवान राम के आशीर्वाद और वरदान स्वरूप धरती पर ही अदृश्य रूप से विचरण करते थे | तब जैसे ही भगवान श्री कृष्ण की पुकार हनुमान जी के कानों तक पहुंची हनुमान जी के मानों रोंगटे खड़े हो गए | 

हनुमान जी गद गद हो उठे मानों उन्हे भगवान श्री राम जी ने याद किया हो | तुरंत हनुमान जी तीव्र गति से उड़ते हुए भगवान श्री कृष्ण के पास पहुँच जाते है |

 

हनुमान जी  जैसे ही आए वह भगवान श्री कृष्ण के इस  अवतार को देख उन्हे पहचान नहीं पाए  तब श्री कृष्ण ने हनुमान जी को अपने द्वापर युग वाले अवतार  श्री राम की याद दिलाई और बताया की  मैं ही राम हूँ और अब इस त्रेतायुग मे पाप का नाश करने के लिए फिर से  अवतरित हुआ  हूँ इस युग मे मेरा नाम वशूदेव कृष्ण हैं | 

 

इतना सुनते ही हनुमान जी जय श्री राम का स्मरण करते हुए सर झुका कर श्री कृष्ण जी को प्रणाम करते है | 

 

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हनुमान कृष्ण जी के सामने आते ही उन्हें प्रणाम करते हैं. और तुरंत बोलते हैं प्रभु क्या आज्ञा हैं मेरे लिए.

 तब श्री कृष्ण जी हनुमान जी को बोलते हैं यहाँ से 1कोस दूर एक सुंदर वाटिका हैं. वहां बहुत ही स्वादिष्ट फल लगे हैं तो जाओ हनुमान उन फलों का आनंद लो और कुछ मेरे लिए भी लें आना.

 

हनुमान जी तरंत उस वाटिका मे पहुँच जाते हैं. और सुंदर मीठे फलों का आनंद लेते हैं| हनुमान जी अपने बंदर और चंचल स्वभाव की वजह से वृक्षो को नुकसान पहुंचाने लगते है यह खबर आग की तरह द्वारिका नगरी मे फ़ेल जाती है की एक विशाल उद्दंड वानर पूरी वाटिका को तहस नहस कर रहा है | 

 

अब यह खबर जैसे ही श्री कृष्ण तक पहुँचती है ! भगवान कृष्ण तुरंत अपने वाहन गरुण राज को याद करते है | गरुणराज तुरंत भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख प्रगत हो जाते है | 

 

श्री कृष्ण जी गरुण को आदेश देते हुए कहते हैं की द्वारिका की सुंदर वाटिका मे एक विशाल  मायावी वानर घुस आया है वो बहुत अद्दंड मचा रहा है उसे तुरंत बंधी बना कर मेरे सामने ले कर आओ | अपने साथ कुछ सैनिक भी ले जाओ |

 

यह सुन अरुणराज बोलते है – प्रभु ! उस वानर के लिए मैं अकेला ही काफी हूँ भला सैनिको की क्या जरूरत , अब आज्ञा दें महाराज |

यह सुन श्री कृष्ण मुस्करा देते है और बोलते है – जैसी आपकी इच्छा |

 

अब गरुण जी तुरंत अपनी तीव्र गति से उस वाटिका मे पहुँच जाते है और हनुमान जी को बोलते है चलो तुम्हें श्री कृष्ण जी ने तत्काल बुलाया है |

यह सुन हनुमान जी बोलते है मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता| यह सुन गरुण जी क्रोधित हो उठते है और हनुमान जी पर अपने अस्त्रों से प्रहार कर देते है | हनुमान जी आसानी से उनके हर प्रहार को विफल कर देते है फिर अपनी पूछ को विशाल करके गरुण जी को उसी मे लपेट लेते है | 

 

 

गरुण जी अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं  लेकिन फिर भी उस जकड़न से निकल नहीं पाते | तब गरुण जी को समझ आता है यह कोई साधारण वानर नहीं यह जरूर कोई मायावी है |

 

 

हनुमान जी तुरंत अपनी पूछ को ज़ोर से झटका देते है और गरुण जी दूर नदी मे जा गिरते है | गरुण जी अब किसी तरह बचते बचाते वाहन से चले जाते है और पुनः भगवान श्री कृष्ण के पास पहुँच जाते है |

 

 

गरुण जी श्री कृष्ण को बताते हैं की – हे प्रभु ! मुझे क्षमा  करे,  मैं उस वानर को नहीं ला पाया वह बहुत ही मायावी वानर है जिसके सामने मेरी शक्तियाँ और बल कमजोर पड़ गए | 

 

 

गरुण जी की इस बात को सुन, श्री कृष्ण जी मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए और सोचने लगे की इस घटना से गरुण जी की  ताकत का घमंड तो टूट गया | लेकिन अभी भी उनका एक घमंड टूटना बाकी है और वो है उनकी गति का घमंड |

 

 

यह विचार कर श्री कृष्ण जी बोलते है – हे गरुण ! आप चिंता न करे आप ने अपनी तरफ से जो प्रयास किया वो काबिलेतारीफ है |

मैंने अभी अपनी शक्तियों से पता लगाया है की वह कोई साधारण वानर नहीं वह स्वयं राम भक्त हनुमान जी है | इसीलिए जब आपने मेरा नाम लेकर उनको आने को कहा तो वह नहीं आए |

 

 

इस बार फिर से जाओ और उनको कहना आपको भगवान श्री राम ने बुलाया है |उनको तुरंत अपनी पीठ पर बैठा कर ले आओ |

 गरुण जी फिर से हनुमान जी के  समक्ष आ खड़े होते है और उन पर प्रहार करने की क्षमा मांगते है | फिर बोलते है चलिये आपको श्रीराम ने बुलाया है |

 

श्री राम का नाम सुन हनुमान जी प्रसन्न हो जाते है और कहते हैं ठीक है आप चलो मैं आता हूँ  गरुण जी कहते हैं आप मेरी पीठ पर बैठ जाएँ मैं तुरंत अपनी तीव्र गति से आपको श्री राम जी के पास पहुंचा दूँगा |

हनुमान जी कहते है नहीं नहीं आप जाइए हम आपके पीछे पीछे आते है |

 

गरुण जी तेजी से उड़ान भरते हैं | वही श्री कृष्ण जी यह सब कुछ देख रहे थे और वह जानते थे की हनुमान जी गरुण से पहले पहुँच जाएंगे |

यह सोच वह श्री राम का अवतार धरण करके अपनी पत्नी सत्यभामा को सीता मटा की तरह सजा कर अपने साथ सिंहासन पर बैठा देते है | 

 

अब श्री कृष्ण जी तुरंत अपने सुधरशन चक्र को आदेश देते हैं की जाओ द्वार पर खड़े हो जाओ पहरा दो | कोई भी अपरिचित इंसान अंदर न आने पाए |

 

अब सुधरशन भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए द्वार पर खड़े हो जाते है | इतने मे हनुमान जी द्वार पर आ खड़े होते हैं और जैसे ही हनुमान जी अपने प्रभु श्री राम को मिलने की उतत्सुकता मे अंदर प्रवेश करने लगते है | सुधरशन तुरंत हनुमान जी को सावधान कर देता है और बोलता है कौन हो तुम ? तुम अंदर नहीं जा सकते ? 

 

हनुमान जी बोलते है मुझे अपने प्रभु से मिलने से कोई नहीं रोक सकता किरप्य रास्ते से हट जाए और मुझे अंदर जाने दें | सुधरशन चक्र रास्ते से नहीं हटते | यह देख हनुमान जी सुधरशन को अपने मे दबा कर अंदर प्रवेश कर जाते है |

 

अंदर सिंहासन पर  भगवान श्री राम के रूप मे बैठे श्री कृष्ण जी को  प्रणाम करते हुए जब उनके साथ बैठी स्त्री  यानी  सत्यभामा को देखते हैं तो कहते हैं – हे प्रभु ! मटा सीता कहाँ है ?और आपके साथ यह दासी कौन है ? 

 

यह सुन सत्यभामा दंग रह जाती है और मन ही मन  इतना साज शृंगार करने के बाद भी यह मुझे दासी बोल रहे है – यह सोच कर बहुत निराश हो जाती है |यहीं पर सत्यभामा का अपनी सुंदरता का अभिमान टूट जाता है |

 

इतने मे गरुण जी तेज गति से उड़ने के कारण हाफते हुए पहुँचते हैं और हनुमान जी को पहले से ही पहुंचा देख दंग रह जाते है और हनुमान जी के चरणों मे गिर जाते है |

 

इस तरह गरुण की तेज गति और बल का घमंड भी चूर चूर हो जाता है |

अब श्री कृष्ण जी हनुमान जी से पूछते है – हे हनुमान ! आप अंदर कैसे आए क्या आपको द्वार पर किसी ने रोका नहीं था ?

हनुमान जी बोले – हे प्रभु ! मुझे सुधरशन चक्र ने रोका था लेकिन मैंने सोचा आपके दर्शन मे विलंब होगा इसलिए मैं उनसे उलझा नहीं और उनको मैं अपने दातों मे दबा लिया |

इतना कह कर हनुमान जी ने सुधरशन को अपने दातों से निकाल कर भगवान श्री कृष्ण के चरणों मे रख दिया | इसके बाद श्री कृष्ण जी ने हनुमान जी को अपने गले से लगा लिया |

 

तो दोस्तो चलिये जानते है इस धार्मिक कथा से क्या सीख मिलती है | इस कथा से हमे यह सीख मिलती हैं की जीवन मे कभी भी किसी बात को ले कर अभिमान मत करना |

सब कुछ उस ईश्वर का दिया हुआ है वो चाहे तो आपको फकीर बना दे और चाहे तो राजा | यह सब आपके सुंदर व्यक्तित्त्व पर निर्भर करता है की हमे हनुमान जी जैसा उदारवान बनना है या फिर रावण जैसा अभिमानी |

जीवन मे कभी अभिमान न करे |

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