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new moral stories in hindi | आध्यात्म की शक्ति

new moral stories in hindi | आध्यात्म की शक्ति (hindi kahaniyan )- दोस्तों स्वागत है आपका किस्से कहानियों इस रोचक दुनिया मे |यहा मिलेगा आपको जीवन बदल देने वाली ज्ञान से भरी शिक्षाप्रद नैतिक कहनियों का अद्भुत भंडार |

यहाँ पर आपको new motivational stories के साथ moral stories से मिलने वाले ज्ञान से रुबारू करवाया जाता है |यहाँ हम आपके लिए ऐसी motivational stories लेकर आते है ,जिसे पढ़ने से आपके जीवन मे न सिर्फ एक सकारात्मक बदलाव आता है बल्कि आप अपनी ज़िंदगी मे वो सब कुछ हासिल कर पाते हो जिनकी आपने कल्पना की थी – जिन कामयाबी की उचाइयों को छूने के सपने आपने अपनी खुली आखों से देखे थे | यहाँ हम आपके लिए moral stories भी लेकर आते है हर कहानी मे एक सीख जरूर छुपी होती है  जिनसे आपको  बहुत कुछ सीखने को मिलता  है जो आपकी ज़िंदगी मे बहुत काम  आती है |

दोस्तो ऐसी ही हजारो शिक्षाप्रद , लोकप्रिय और रोचक कहानियों का सफर हम आप तक लेकर आए है जिन्हे लोगों ने बचपन मे अपने दादा दादी – या  नाना- नानी  से सुनी होती है या फिर टीवी मे देखी होती है | लेकिन यहाँ पर आपको ऐसी बहुत सी शिक्षा प्रद , लोकप्रिय और रोचक कहानियाँ मिलेंगी जिसे शायद ही आपने कही सुनी होंगी |

तो पढ़ते रहिए ऐसी कहानियाँ और सीखते रहिए एक नई सीख  ,साथ मे ऐसी शिक्षा प्रद कहानियाँ  अपने दोस्तो को भी शेयर करते रहिए |

जरुए पढ़ें – अध्यात्म क्या है 

आध्यात्म की शक्ति | new moral stories in Hindi

 

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आध्यात्म के ज्ञान से गुस्सा कैसे शांत किया जा सकता है ?

देखिये पहले तो जिन लोगो ने इस सवाल का जवाब अपने सीमित ज्ञान से दिया उनका दिल से स्वागत करता हुँ .और रही बात इस सवाल के जवाब की ! तो मात्र 10-15 लाइनों मे इसका जवाब किसी भी प्रकार से  मन को संतुस्टी प्रदान नहीं कर सकता |

आप चाहे तो Google पर सर्च कर लेना या फिर यूट्यूब (YouTube) पर सर्च कर लेना वहाँ पर आपको गुस्सा शांत करने से संभंधित टिप्स के रूप मे तमाम ज़वाब मिल जाएंगे जहां घूम फिर कर वो लोग आपको एक से एक ज़वाब देते हुए योगा पर आकर रुक जाएंगे.

क्योंकि उन लोगो के अनुसार और उनके अपने सीमित ज्ञान के अनुभव से वह गुस्सा शांत रखने के लिए योगा से बेहतर और कोई विकप्ल नही मानते.

हाँ उनकी इस बात यानी योगा से मैं भी अपनी सहमति जताता हुँ. लेकिन क्रोध नियंत्रण यह ज़वाब पूरा सच नही है.मेरे मन को तो बिलकुल भी संतुस्ट करने वाला नहीं. हो सकता है आपका मन भले ही ऐसे जवाबों से संतुस्ट हो जाए.

लेकिन जब मैं !  मन को संतुस्ट करने वाले असली और सही ज़वाब से आपको रूबरू करवाऊंगा तब आपकी भी मानसिकता पूरी तरहां से बदल जाएगी. की क्या योगा ही गुस्सा शांत करने का बेहतर तरीका है?

गुस्सा ना करने को लेकर आप चाहे कितना भी खुद को समझा लें, चाहे कितनी भी शर्ते और कसमें खा लें. एक समय ऐसा आएगा या एक स्तर ऐसा आएगा! जब आपकी ये सभी शर्ते, कसमें धरि कि धरि रह जाएंगी.

 

क्योंकि ऐसा होना ही है यह संभाविक है.

चलिए इस बात को आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों रूपों से समझने कि कोशिश करते है कि

(गुस्सा आना लाज़मी) आखिर ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए !क्योंकि गुस्सा करना, हसना, रोना, आध्यात्मिक भाषा मे हमारी भावनात्मक चेतनाए होती है.

ठीक इसी प्रकार वैज्ञानिक नज़रिये से यह सब मन के अंदर यथा ज्ञान कि एक दिमागी प्रतिक्रियाएं होती है. जो शरीर के बाहर एक शारीरिक प्रतिक्रियाओं द्वारा देखने को मिलती है.

इसलिए जब आप खुद से या किसी और से गुस्सा ना करने के कसमें वादे खाते है तो यह बहुत लम्बे समय तक कारगर नहीं होता. और एक समय ऐसा आता है कि आप खुद को रोकते रोकते गुस्सा कर ही देते हो.

(यह बात मै आपको बता दूँ कि गुस्सा करना तो शरीर के लिए हानिकारक है ही साथ मे गुस्सा रोकना इससे भी अधिक खतरनाक और हानिकारक होता है, जो कि एक शोध मे सिद्ध भी हो चुका है )

क्योंकि आध्यात्म के अनुसार आप ज़बरदस्ती कसमें- वादे जैसी मज़बूरी का ढाल बना कर मन को उल्लू बनाते हुए गुस्सा जैसी दीमाग कि प्रकृतिकी प्रतिक्रिया को रोकने कि कोशिश कर रहे हो. तो ऐसे मे लाज़मी है कि ऐसा करने से आपके मस्तिष्क पर दबाव पड़ रहा है. जिसका परिणाम आपके दीमाग कि सोचने समझने कि शक्ति को इतना कम कर सकता है कि आप पागल पन के स्तर तक पहुंच सकते है.

 

इसके इलावा आप ऐसा करके अपने दीमाग से उस गुस्से को शारीरिक प्रतिक्रिया द्वारा बाहर ना निकाल कर ,उसे दीमाग तक ही सीमित कर लेते हो, जिसका नतीजा- वह अंदर ही अंदर पनपता हुआ एक बड़ा रूप लें लेता है जो कि भविष्या मे सब्र का बांध टूटने से एक खतरनाक शारीरिक प्रतिक्रिया द्वारा बाहर निकलता है.

 

अक्सर वो लोग जो दूसरों से या खुद से गुस्सा न करने के कसमें-वादे करने के बाद  कई बार गुस्सा आने पर भी अपनी प्रतिक्रिया तब तक नहीं दिखते जब तक बात उसके खुद पर या उसके किसी बहुत चाहने वाले पर या उसके सगे सम्बन्धी तक नहीं पहुँचती.

इस बात पर आध्यात्मिक और विज्ञान दोनों ही एक मत होकर यह कहते है कि, कसमें -वादे या अन्य और कोई भी तरीका अपना कर आप दीमाग और गुस्से के बीच एक समझौता कर रहे है. यह तो एक समझौता करना हुआ. जो कि गुस्से को फटने से अधिक देर तक नहीं रोक सकता  क्योंकि दीमाग खुद पर कभी जादा प्रेशर(दबाव) नहीं पड़ने देता|

जिस वजह से दिमाग गुस्से के इकट्ठा होने की वजह से खुद पर पड़ रहे दबाव को बाहर निकालने के लिए आपकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं का सहारा लेता है यानि की दिमाग खुद को संतुस्ट करने के लिए आपको गुस्सा बाहर  निकालने के लिए शारीरिक प्रतिक्रिया करने पर मज़बूर कर देगा. क्योंकि दीमाग खुद पर पड़ रहे दबाव को एक सीमित क्षमता तक ही रोक कर रख सकता है ,उससे अधिक नहीं.

 

क्या गुस्से पर पूरी तरह से काबू पाया जा सकता है?

इसका सवाल ज़वाब देते हुए मैं कहूंगा कि हाँ, बिलकुल पाया जा सकता है. ना सिर्फ काबू पाया जा सकता बल्कि दीमाग से गुस्सा पूरी तरह खत्म भी किआ जा सकता है. इसके लिए आपको अपने दीमाग पर पूरी तरह से नियंत्रण करना होगा.

 

क्या दीमाग पर पूरी तरह नियंत्रण करना संभव है?

इस सवाल का ज़वाब देते हुए मैं कहूंगा कि हाँ, बिलकुल किया जा सकता है. 100% किया जा सकता है. इस बात को समझाने के लिए मैने आध्यात्म ज्ञान का सहारा लेते हुए नीचे इसके बारे में विस्तार से बताया है.ध्यान लगाना अध्यात्म की ओर कदम बढ़ाने की पहली सीढ़ी है |

आध्यात्म ज्ञान कि शक्ति कितनी अद्भुत होती है और इसकी मदद से आप अपने दिमाग को कितना विस्तृत कर सकते है. इस पर नेपाल में हुए एक शोध द्वारा यह बात दर्ज कि गई है ,

 

तो इस बात को अच्छे से समझाने के लिए मैं हरजीत मौर्या विस्तार से इस सवाल का ज़वाब देने जा रहा हुँ.

इस बात को समझाने के लिए मैं विज्ञान और आध्यात्म दोनों का सहारा लूँगा. जिसमे योगा भी एक सहायक के रूप मे काम करेगा.

वैज्ञानिक नज़रिया -आध्यात्म की शक्ति

पहले तो आपको एक वैज्ञानिक नज़रिये से यह समझना होगा की गुस्सा आता ही क्यों है .यदि आप कुछ बोलते हो या फिर कोई भी काम करते हो चाहे वो काम खाना, पीना, लेटना, बोलना, चलना, मारना, कूदना , डाटना गुस्सा करना, प्यार, मोहोब्बत, धोखा, या कोई भी फीलिंग्स या फिर फेस का कोई भी एक्सप्रेशन – कुछ भी हो ,यह सब एक शारीरिक प्रतिक्रिया मानी जाती है. जो दीमाग से होते हुए निकलती है. तो ऐसी लाखो प्रतिक्रियाओं की बुनियाद सिर्फ और सिर्फ एक ही चीज होती है, वो है हमारा मस्तिष्क |

लाख उम्मीदों के बाद भी जब  कोई क्रिया हमरे मन अनुसार नहीं हो रही होती या कोई हमारी बात नही मान रहा होता तो ऐसी परिस्थिति मे कई बार गुस्से के साथ साथ मन डिप्रेशन का शिकार भी हो जाता है

गुस्सा आने का सबसे बड़ा कारण हमारा दीमाग होता है. क्योंकि की ऐसी कोई भी बात या घटना जो हम सुनते है या देखते है, वो अगर मन को अच्छी नही लगती तो ऐसी स्थिति मे हमारा दीमाग हम पर हावी होते हुए एक मिनी सेकेंड मे तुरंत प्रतिक्रिया देनी शुरू कर देता है.

ऐसी स्थिति मे शरीर मे अक्सर खून का बहाव तेज़ हो जाता है जिस वजह से शरीर का तापमान बढ़ जाता है और शरीर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दिखाने लगता है – इसी को हम गुस्सा कहते है|

जिसका नतीजा कई अलग अलग रूप मे देखने को मिलता है यानी वो एक गुस्सा बन के जिसका सफर एक दिमागी

रिएक्शन से शुरू हुआ और आते आते शरीर की कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं के रूप मे बट गया जो कि कुछ इस तरीके से देखने को मिलता है. जैसे –

मुहं के एक्सप्रेशन खराब होने लगते है,

आँखों की भौहें सिकुड़ कर इकट्ठी हो जाती है

माथे पर बल आजाते है.

होंठ सिकुड़ जाते है

आवाज़ मे बदलाव आजाता है

बोलने का तरीका बदल जाता है

ऊँची आवाज़ मे बोलना और शब्दो की मर्यादा को भूल जाना 

गली गलौज जैसे शब्दों का उपयोग करता है

आँखे लाल हो जाती है

यहाँ तक की हाथ पैर चलाने की नौबत आजाती है

खून का संचार तेज़ हो जाता है

शरीर का तापमान बढ़ जाता है

शारीरिक गतिविधियों मे बदलाव

दाँतो का पीसना

जैसी सभी प्रतिक्रियाएं अक्सर गुस्से मे एवं गुस्से के रूप मे ,देखने को मिलती है और यह सब प्रतिक्रियाएं एक साथ नहीं आती. प्रतिक्रिया कब – कितनी -और किस तरह की आने वाली है यह सामने वाले ( गुस्सा करने वाले ) इंसान के गुस्से के स्तर पर निर्भर करता है.

इस प्रकार इंसान इन सब प्रतिक्रियाओं का उपयोग करते हुए अपने गुस्से को व्यक्त करता है अथवा प्रकट करता है. गुस्से का स्तर क्या है कितना है? यह उसकी आने वाली प्रतिक्रियाओं से पता लग जाता है.

तो दोस्तों यह तो आप समझ ही गए होंगे की गुस्से की एक वैज्ञानिक वजह क्या है?.

चलिए अब इस बात को जानते है और समझते है की गुस्सा कैसे ख़त्म किया जा सकता है.?

दोस्तों जैसा की आपने अभी विज्ञान के नज़रिये से गुस्से की असल वजह को जाना ओर समझा. तो इस से यह बात निकल कर आती है की गुस्सा करना या ना करना इंसान के हाथ मे है ना की दीमाग (मस्तिष्क ) के हाथ मे. क्योंकि दीमाग भी तो इंसान के शरीर मे ही विराजमान है.

तो दोस्तों जैसे ऊपर मैंने आपको विज्ञान का सहारा लें कर इस बात को समझाने का प्रयत्न किया कि गुस्सा क्या है? गुस्सा आने कि क्या वजह है? और गुस्से कि कौन कौन सी तमाम प्रतिक्रियाएं होती है.?

अब अध्यात्म ज्ञान का सहारा लेकर मैं आपको यह समझाने का पूरा प्रयास करूंगा कि आध्यात्म ज्ञान + योग साधना से कैसे आप अपने पूरे दीमाग पर नियंत्रण पा कर ना सिर्फ गुस्सा बल्कि लोभ, मोह, माया, अहंकार, ईर्षा, जैसी चीज़ो पर भी पूरी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है.

चलिए मैं इस पर यानी गुस्सा VS आध्यात्मिक ज्ञान + साधना कि शक्ति पर आधारित आपको एक सच्ची घटना से रूबरू करवाता हु.

 नेपाल देश मे गुस्से को लेकर एक शोध कार्यक्रम चलाया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि इंसान गुस्से को किस हद तक नियंत्रण मे रख सकता है.आध्यात्म की शक्ति new moral stories in hindi

यह शोध करने के लिए उन शोध कर्ताओ ने दो समझदार ज्ञानी लोगो का चयन किया . बस फर्क इतना था कि एक पेशे से वकील था जिसे बहुत सारी किताबों का ज्ञान था बहुत पढ़ा लिखा था.

दूसरा एक मोंक यानी बौद्ध भिक्षु था-  जिसे उस वकील  जितना किताबों का ज्ञान तो नहीं था पर उसे आध्यात्मिक ज्ञान बहुत था. वेदो और शास्त्रो का भी कुछ ज्ञान था |यह शोध उन दोनों लोगो को बिना बताए किया जा रहा था.

तो इस शोध पहले वकील के साथ गुस्सा दिलाने वाली उन हर क्रियाओ को किया गया जिससे किसी भी इंसान का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच जाए.

वकील के साथ उन शोध कर्ताओं ने जो भी क्रियाए कि उनमे वकील ने गुस्से कि वो सभी प्रतिक्रियाए दे डाली जो अक्सर इंसान गुस्से मे करता है.पर बाद मे उस वकील को बता दिया जाता है कि आप शांत हो जाए यह सिर्फ शोध कार्यक्रम था.

इसके बाद ठीक दूसरी तरफ जब ऐसा ही उस मोंक यानी भिक्षु के साथ किया गया तो नतीजे काफ़ी चौंका देने वाले थे.

भिक्षु ने उन कि किसी भी क्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया नही दिखाई.,मानो भिक्षु पर उन सब क्रियाओं का कोई असर ही ना हो रहा हो. यह देख शोध कर्ताओं के पसीने छूट गए और होश उड़ गए. कि कैसे कोई इंसान इतना शांत रह सकता है. कैसे इसने अपने गुस्से को इतना काबू किया?

वो लोग भिक्षु के पास गए और बोला कि यह एक शोध कार्यक्रम था. जिसमे लोगो पर एक शोध के ज़रिये यह पता लगाया जा रहा था कि इंसान अपने गुस्से को किस हद तक काबू कर सकता है. फिर जिज्ञासा वश उन लोगो ने भिक्षु से पुछा कि आपने अपने गुस्से पर कैसे इतना काबू रखा. आपने कोई प्रतिक्रिया क्यों नही दिखाई?

 

इस पर भिक्षु ने बड़े ही शांत स्वर मे बोला कि प्रतिक्रिया तो तब दिखता जब मुझे गुस्सा आता? मुझे गुस्सा आया ही

नही.. सच कहूँ तो गुस्सा आता भी तो भी मैं प्रतिक्रिया ना देता.

भिक्षु जी बोले ! देखिये पहले तो इस बात को अच्छे से समझने की कोशिश करें कि दीमाग आपके अंदर है, नाकि आप दीमाग के अंदर. तो फिर दीमाग को खुद पर क्यों हावी होने दे रहे हो. बजाय कि आपको खुद दीमाग पर हावी रहना चाहिए. कुल मिलाकर इस बात का मतलब यह है कि आपका अपने दीमाग पर पूरी तरह से नियंत्रण होना चाहिए.

 

इस पर उन शोधकर्ताओं ने भिक्षु महारज से बड़ी उत्सुकता से पुछा कि आख़िरकार दीमाग पर इंसान पूरी तरह से कैसे नियंत्रण पा सकता है?

इस पर भिक्षु महाराज कहते है कि – बिलकुल पा सकता है, 100% पा सकता है.

इस बात को इतने हौसले (confident) से मैं इसलिए बोल रहा हु क्योंकि इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं खुद हूं.

मैंने खुद विज्ञान, योग साधना -ध्यान विद्या और अध्यात्म ज्ञान का सहारा लेकर इस बात को सिद्ध कर दिखाया है कि मस्तिष्क पर पूरी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है. जिसका एक छोटा सा नमूना अभी आप लोग कुछ देर पहले देख ही चुके है.

भिक्षु जी कहते है कि दिमाग़ आपका मालिक नहीं बल्कि आप अपने दिमाग़ के मालिक है, तो दिमाग़ को खुद और हावी ना होने दो.

अब मैं आपके सवाल का ज़वाब देता हु कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ कि मुझे गुस्सा क्यों नहीं आया और आया भी तो!फिर उस पर कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी. तो इसका एक ही ज़वाब है वो है मेरा अपने दिमाग़ पर पूरी तरह से नियंत्रण का होना.

जो कि सिर्फ एक वजह से ही संभव हो पाया है और  वो है आध्यात्म ज्ञान – योग साधना यानी ध्यान विद्या . आध्यात्म ज्ञान के लाखो सकारात्मक विचारो कि शक्ति और योग साधना कि सकारात्मक  ऊर्जा, मुझे गलत चीज़ो, गलत विचारो पर किसी भी प्रकार कि ऐसी प्रतिक्रिया करने से तुरंत रोकता है जिसके करने से सिर्फ खुद का नुकसान होना होता है. 

इनकी शक्ति और ज्ञान से उन सभी घटनाओ, गतिविधियों और बातो का तुरंत पता लगाया जा सकता है या लग जाता है,कि वह सही नहीं, तथा नकारात्मक है. जिससे हम प्रतिक्रिया नहीं करते.

दूसरी तरफ रही गुस्से कि बात ठीक गुस्सा भी उन नकारात्मक बातो और घटनाओ का हिस्सा है जिस पर किसी भी प्रकार की नकारात्मक प्रतिकृया देने  से आध्यात्म ज्ञान हमें रोकता है. ये होती है अध्यात्म की शक्ति.

 

इस प्रकार गुस्से को तभी शांत या खत्म किया जा सकता है जब आपका आपके दिमाग पर पूरी तरह से नियंत्रण होगा. और यह तभी संभव हो सकता है जब मन शांत होगा. और मन तभी शांत होगा जब मन मे सकारात्मक बातो का, सकारात्मक ऊर्जा का वास होगा.और यह सबसे अधिक मिलता है आध्यात्मिक ज्ञान से. जितना अधिक आप आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करोगे उतना ही आप अपने मन पर नियंत्रण पा सकोगे.

इसके बाद मन को शांत करने अथवा मन मे सकारात्मक ऊर्जा लाने का दूसरा सबसे बड़ा साधन, *साधना* यानी योग है जिसका सबंध ध्यान लगाने और ओम का जाप करने से है. क्योंकि ओम शब्द खुद मे ही एक बहुत बड़ी सकारात्मक ऊर्जा है. इस शब्द का आँखे बंद करके लम्बे स्वर मे जाप करने से ध्यान ज़ल्दी लगता है जिस वजह से मन के साथ साथ पूरी शरीर मे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.आध्यात्म की शक्ति new moral stories in hindi

दोस्तों मन पर नियंत्रण पाने से ना सिर्फ आप गुस्से को काबू मे रख सकते ही बल्कि वो सब कुछ अपने दीमाग से करवा सकते है जो आप चाहते हो.. दोस्तों आप अंदाजा नही लगा सकते कि दीमाग कि कितनी शक्ति होती है.

दीमाग पर नियंत्रण से आप जितना चाहे अपने दीमाग कि शक्ति जगा सकते है बढ़ा सकते है..

 

अध्यात्म ज्ञान , योग, और साधना कि शक्ति से आप पूरे ब्रम्हांड के हर रहस्य को समझ सकते है.

अध्यात्म ज्ञान , योग, और साधना कि मदद से हम अपने दीमाग को इतना विस्तृत और शक्तिशाली बना सकते है जिससे आप अपने शरीर और आत्मा को समझ सकते है. आत्मा को अपने शरीर से अलग कर कही भी लेजा सकते है.

तो दोस्तों कैसा लगा आपको यह विज्ञान और आध्यात्म का रोचक ज्ञान? नीचे टिप्पणी करते हुए अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर देना. मै अक्सर जीवन मे काम आने वाली ऐसी ही तमाम जानकारी लेकर आता रहता हूँ इसके साथ मैं हरजीत मौर्या अब आपसे विदा लेता हूं, जय हिन्द, जय भारत.

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